Monday, 3 September 2018

इमोशनल ईटिंग हो सकती है मोटापे का कारण, ऐसे करें बचाव

इमोशनल ईटिंग यानी भूख के बजाय भावना के वशीभूत होकर खाना खाना। भूख लगने पर खाना सभी खाते हैं और ये सामान्य बात है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो पेट भरा होने के बावजूद खाने की कोई चीज देखते ही उस पर झपट पड़ते हैं। यही इमोशनल ईटिंग है। कई लोग तनाव, चिंता और लालच के कारण भी इमोशनल ईटिंग का शिकार हो जाते हैं। खाना हमारे शरीर के लिए जरूरी है मगर जरूरत से ज्यादा खाना शरीर के लिए हानिकारक भी है। इमोशनल ईटिंग की आदत से आपको न सिर्फ मोटापे की समस्या हो सकती है बल्कि कई तरह के रोगों का खतरा भी होता है।

लोग क्यों होते हैं इमोशनल ईटिंग का शिकार

इमोशनल ईटिंग का मतलब है भावनात्मक भूख, यानी पेट भरा होने पर भी स्वाद के लालच में जरूरत से अतिरिक्त खाना खा लेना। इमोशनल ईटिंग के कई कारण हो सकते हैं। आमतौर पर लोग खुशी के मौके पर इमोशनल ईटिंग ज्यादा करते हैं। शादी, पार्टी, फंक्शन या अन्य जश्न के मौके पर जब आप कई लोगों के साथ इकट्ठा होते हैं और खाने के लिए कुछ खास चीजें होती हैं, तो अक्सर आप शरीर की जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। कई लोगों को अकेलेपन और ऊब के कारण भी खाने की आदत हो जाती है। इसके अलावा कुछ लोग दुख और परेशानी में भी खाने-पीने की तरफ भागते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो थकान होने पर चाय, कॉफी, स्नैक्स आदि की आदत डाल लेते हैं, जबकि उनके शरीर को अतिरिक्त आहार की जरूरत उस समय नहीं होती है।

क्यों खतरनाक है इमोशनल ईटिंग


इमोशनल ईटिंग इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसमें आप खाने का सुख लेने लगते हैं। इससे आपका पेट तो भर जाता है मगर आपको तृप्ति नहीं मिलती है। एक-दो बार आपने किसी भावना के कारण इमोशनल ईटिंग कर ली, तो आपका दिमाग अक्सर आपको मानसिक संवेदना भेजकर खाने के लिए उकसाने लगता है। इमोशनल ईटिंग की खास बात ये है कि ज्यादा खाने के बाद आपको पछतावा भी होता है और अपने ऊपर गुस्सा भी आता है मगर आप अगली बार भी खाने से खुद को नहीं रोक पाते हैं।

हो सकते हैं मोटापे का शिकार


इमोशनल ईटिंग आपको कई तरह के रोगों का शिकार बना सकती है। आमतौर पर इमोशनल ईटिंग वाले लोग मोटापे का शिकार हो जाते हैं। जरूरत से ज्यादा खाने से शरीर खाने के सभी पोषक तत्वों का इस्तेमाल नहीं कर पाता है, जिससे कई तरह की गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं। मोटापा खुद में सैकड़ों बीमारियों की वजह बनता है इसलिए इमोशनल ईटिंग को रोकना बहुत जरूरी है। अपनी भावनाओं पर काबू पाकर और इमोशनल ईटिंग के कारणों को पहचानकर आप इससे आसानी से बच सकते हैं।

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Wednesday, 22 August 2018

मच्छरों से परेशान हैं क्या? ये रहे तुरंत मच्छर भगाने के 3 सबसे कारगर और घरेलू उपाय



मच्छर यानि आपके सिर पर मंडराता बीमारियों का खतरा... बीमारियों से बचना है तो मच्छरों से बचना जरूरी है। लेकिन अगर घर में कॉइल या मॉस्कीटो लिक्विड नहीं है तब आप क्या करेंगे? चलिए हम बताते हैं मच्छरों के लिए 3 ऐसे कारगर घरेलू उपाय, जो आपकी इस समस्या को तुरंत दूर कर देंगे.



जानिए पहला उपाय, जो मात्र 2 मिनट में मच्छरों को रफूचक्कर कर देगा। इसके लिए आपको जरूरत है 3 चीजों की -


1. नीम का तेल


2. कपूर 


3. तेजपत्ता


सबसे पहले नीम के तेल में कपूर मिलाकर एक स्प्रे बॉटल में भर लें। अब इस मिश्रण का तेजपत्तों पर स्प्रे करें और तेजपत्ते को जला लें। तेजपत्ते का धुंआ सेहत के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है।



इस धुंए के असर से आश्चर्यजनक रूप से घर के सभी मच्छर भाग जाएंगे।



दूसरा उपाय - सोते समय कुछ दूरी पर, सिरहाने कपूर मिले नीम के तेल का दीपक जलाएं, इससे भी मच्छर आपके पास बि‍ल्कुल नहीं नहीं फटकेंगे।



तीसरा उपाय - नारियल तेल, नीम तेल, लौंग का तेल, पिपरमिंट तेल और नीलगिरी के तेल को आपस में समान मात्रा में मिलाएं और एक बॉटल में भरकर रख लें। रात में सोते समय त्वचा पर लगाएं और निश्चिंत होकर सो जाएं। यह तरीका बाजार की क्रीम से भी ज्यादा प्रभावशाली है।





Thursday, 9 August 2018

during monsoon ear infection is also a common problem -बारिश के मौसम में कान के इंफेक्शन का खतरा


बरसात का मौसम कानों के लिए खराब होता है। इस मौसम में कान के बाहरी भाग में जीवाणु और फंगल इंफेक्शन बढ़ जाता है। वहीं, कान के बीच वाले भाग में ओटाइटिस मीडिया नामक संक्रमण भी बढ़ जाता है। कान की पुरानी बीमारियां जो अन्य मौसमों में दबी रहती हैं, वे भी मॉनसून में परेशान करने लगती हैं। ऐसे में कुछ चीजों से बचना चाहिए.


नहाते समय रुई लगाएं 


आयुर्वेदाचार्य डॉ बृजेश गुप्ता कहते हैं, नहाते समय कान में रुई लगाकर पानी जाने से बचाएं। कान को ज्यादा साफ न करें क्योंकि इससे कान की त्वचा में चोट लगने और इसके बाद संक्रमण होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। 

स्विमिंग के दौरान रखें ख्याल 


अगर आप बारिश के मौसम में भी तैराकी करते हैं तो दूषित पानी कान में जाने की वजह से बीमारियां बढ़ जाती हैं। ऐसे में स्विमिंग करते समय ईयर प्लग यूज करें। जरूरत पड़ने पर नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें। 


बारिश में भीगने से बचें 


बारिश में भीगने या फिर वातावरण में नमी होने से जुकाम और गला खराब होने की आशंका रहती है। इसका असर भी कानों पर पड़ता है और कान में दर्द या इंफेक्शन हो सकता है।


ठंडे पदार्थों से बचें 


बरसात के मौसम में ठंडे पदार्थों के अधिक सेवन से बचना चाहिए। जुकाम या गला खराब होने पर शीघ्र ही इनका इलाज कराएं वरना कानों में भी दिक्कत शुरू हो सकती है। 

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Wednesday, 25 July 2018

गर्म दवाईयों से नहीं तुलसी के पत्तों से दूर करें वायरल फीवर

मौसम बदलते ही लोग वायरल फीवर की चपेट में आने लगते हैं। इससे निपटने के लिए वैसे तो बाजार में कई एंटीबायोटिक मौजूद हैं, लेकिन शरीर पर इनके साइड इफेक्ट के साथ मुंह का स्वाद भी बिगड़ जाता है।ऐसे में ये  आसान घरेलू नुस्खे आपको सेहत के इस दुश्मन से जल्द राहत दिला सकते हैं।आइए जानते हैं कैसे


अदरक-



वायरल बुखार को ठीक करने के लिए सबसे पहले अदरक के साथ थोड़ी सी हल्दी, काली मिर्च और चीनी मिलाकर उसका काढ़ा बना लें। दिन में तीन से चार बार इस काढ़े को पीने से बुखार दूर होता है। 


धनिया-



एक ग्लास पानी में एक चम्मच साबुत धनिया डालकर उसे पकाएं। पक जाने पर कप में छानकर उसमें स्वादानुसार दूध और चीनी डाल लें। इसको पीने से आपका बुखार झट से गायब हो जाएगा।



तुलसी-



एक मुट्ठी तुलसी के पत्तों और एक चम्मच लौंग पाउडर को एक लीटर पानी में उबाल कर रख लें। इस पानी को हर 2 घंटे के अंतराल पर लें।


मेथी-



रात को एक चम्मच मेथी के दाने भिगोकर रख दें। सुबह मेथी के दाने में नींबू का रस और शहद मिलाकर खाएं। बुखार ठीक हो जाएगा।


चावल-



एक भाग चावल और आधा भाग पानी डालकर पकाएं। जब चावल आधे पक जाएं तो इसके पानी को अलग कर लें। इस पानी में स्वाद के अनुसार नमक मिलाकर पीने से भी वायरल फीवर ठीक हो जाता है।


लहसुन-



लहसुन को छिल लें। अब इसमें शहद लगाकर इसे खाएं। इससे आपका बुखार भाग जाएगा। 


मुनक्का-



रात में मुनक्का भिगो दे। सुबह उसे खाने से बुखार दूर होता है। 

Tuesday, 24 July 2018

केटोजेनिक आहार से बढ़ सकता है कैंसर दवाओं का असर

एक भारतवंशी समेत शोधकर्ताओं के दल ने पाया है कि केटोजेनिक आहार से कैंसर दवाओं के प्रभाव को और बेहतर किया जा सकता है। इस तरह के आहार में उच्च वसा, पर्याप्त प्रोटीन और निम्न कार्बोहाइड्रेट होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ट्यूमर को खत्म करने के उपचार की क्षमता बढ़ाने का नया तरीका खोजा गया है।


इसमें इंसुलिन प्रेरित एंजाइम फॉस्फेटिडिलिनोजिटोल-3 काइनेज (पीआइ3के) को साधा जाता है। इस एंजाइम का संबंध कोशिकाओं की वृद्धि से होता है। अमेरिका के वेल कार्नेल मेडिसिन के शोधकर्ता लेविस सी केंटली ने कहा, 'पीआइ3के को साधने वाली दवा ब्लड शुगर का निम्न स्तर होने पर ही प्रभावी हो सकती है।
हमने पाया कि केटोजेनिक आहार से इंसुलिन को नियंत्रित करने से कैंसर दवाओं का प्रभाव बेहतर किया जा सकता है।' कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता सिद्धार्थ मुखर्जी ने कहा, 'यह अध्ययन कैंसर उपचार को लेकर नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।'
कुछ मरीज हाइपरग्‍लेसेमिया को पैदा करने के लिए और हाई लेवल के ब्‍लड सुगर को कम करने के लिए यह दवा लेते हैं क्‍योंकि इससे अग्‍नाश्‍य ग्रंथि ज्‍यादा इंसुलिन पैदा करती है। अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इरविन मेडिकल सेंटर के शोधकर्ता सिद्धार्थ मुखर्जी का कहना है कि इस दवा को लेने के बाद भी अगर मरीज का ब्‍लड सुगर सामान्‍य स्‍तर पर नहीं आता है तो उसे दवा लेने बंद कर देना चाहिए। यह अध्‍ययन कैंसर के लिए विशिष्‍ट दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है।
उनका कहना है कि दशकों से हम मनुष्‍य के रस प्रक्रिया को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। कीमोथेरपी या इन दवाओं से कैंसर कोशिकाओं को संवदेनशील बनाते हैं। यह तथ्‍य है कि ये दवाएं प्रतिरोध क्षमता को विकसित कर रही हैं कम से कम पशुओं के मॉडल के रूप में। हम मनुष्‍यों में इसे आजमाने के लिए उत्‍साहित हैं।

Monday, 23 July 2018

दुनिया में सबसे ज्यादा दी जाने वाली दवा है ऐंटिबायॉटिक्स: शोध

भारत सहित कई देशों में ऐंटिबायॉटिक दवाओं की आपूर्ति बढ़ने से वैश्विक स्तर पर ऐंटिबायॉटिक्स का असर बुरी तरह बेअसर होता जा रहा है। ऐसा एक शोध में सामने आया है, जिसमें कानून को बेहतर तरीके से तत्काल लागू करने की जरूरत बताई गई है। 


दुनियाभर में बढ़ा ऐंटिबायॉटिक्स का इस्तेमाल 



शोध में पाया गया है कि साल 2000 और 2010 के बीच ऐंटिबायॉटिक्स का उपभोग वैश्विक रूप से बढ़ा है और यह 50 अरब से 70 अरब मानक इकाई हो गया है। इसके इस्तेमाल में वृद्धि में प्रमुख रूप से भारत, चीन, ब्राजील, रूस व दक्षिण अफ्रीका में हुई है।

ऐंटिबायॉटिक का प्रतिरोध भी बढ़ा 


ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के इमानुएल एडेवुयी ने कहा, ‘ऐंटिबायॉटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल ऐंटिबायॉटिक के प्रतिरोध के फैलाव व विकास को सुविधाजनक बना सकता है। उदाहरण के लिए करीब 57 हजार नवजात सेप्सिस की मौतें ऐंटिबायॉटिक प्रतिरोधी संक्रमण के कारण होती हैं।’ इससे अमेरिका में सलाना 20 लाख संक्रमण व 23,000 मौतें होती हैं और यूरोप में हर साल करीब 25,000 मौतें होती हैं। 

संक्रमण से मौत का खतरा अधिक 


एडेयुवी ने कहा, ‘विकासशील देशों में ऐंटिबायॉटिक प्रतिरोधी संक्रमण के भरोसेमंद अनुमानों की कमी है, लेकिन माना जाता है कि इन देशों में कई और मौतों का कारण बनती हैं।’ इस शोध का प्रकाशन ‘द जर्नल ऑफ इंफेक्शन’ में किया गया है। इसमें 24 देशों के शोध का विश्लेषण किया गया है। 

Tuesday, 10 July 2018

नाईट शिफ्ट में काम करने से हृदयरोग और कैंसर का खतरा, पढ़ें रिसर्च

वैज्ञानिकों ने पाया है कि नाईट शिफ्ट में काम करने से मोटापा और मधुमेह का जोखिम बढ़ जाता है जिससे आगे चलकर हृदयरोग , मस्तिष्काघात और कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है.


वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह अनुसंधान किया है. अनुसंधानकर्ताओं में से एक भारतीय मूल का है. उन्होंने उस मान्यता को नकार दिया है जिसके मुताबिक शरीर के दिन और रात के चक्र को मस्तिष्क की मास्टर क्लॉक संचालित करती है.


इन वैज्ञानिकों का कहना है कि यकृत , आहार नली तथा अग्नयाशय की अलग - अलग जैविक घड़ी होती है. विश्वविद्यालय के हांस वान डोनजेन ने बताया , ‘‘ यह किसी को पता नहीं था कि पाचन क्रिया करने वाले अंगों में जैविक घड़ी शिफ्ट में काम करने से कितनी तेजी और कितनी अधिक बदल जाती है. बल्कि मस्तिष्क की मास्टर क्लॉक भी इनके अनुरूप मुश्किल से ही हो पाती है. ''



उन्होंने कहा , ‘‘ इसके परिणामस्वरूप शिफ्ट में काम करने वाले लेागों के शरीर के कुछ जैविक संकेत कहते हैं कि यह दिन है जबकि कुछ संकेत कहते हैं कि यह रात है , इस तरह चयापचय में गड़बड़ी हो जाती है.''