Monday, 3 September 2018

इमोशनल ईटिंग हो सकती है मोटापे का कारण, ऐसे करें बचाव

इमोशनल ईटिंग यानी भूख के बजाय भावना के वशीभूत होकर खाना खाना। भूख लगने पर खाना सभी खाते हैं और ये सामान्य बात है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो पेट भरा होने के बावजूद खाने की कोई चीज देखते ही उस पर झपट पड़ते हैं। यही इमोशनल ईटिंग है। कई लोग तनाव, चिंता और लालच के कारण भी इमोशनल ईटिंग का शिकार हो जाते हैं। खाना हमारे शरीर के लिए जरूरी है मगर जरूरत से ज्यादा खाना शरीर के लिए हानिकारक भी है। इमोशनल ईटिंग की आदत से आपको न सिर्फ मोटापे की समस्या हो सकती है बल्कि कई तरह के रोगों का खतरा भी होता है।

लोग क्यों होते हैं इमोशनल ईटिंग का शिकार

इमोशनल ईटिंग का मतलब है भावनात्मक भूख, यानी पेट भरा होने पर भी स्वाद के लालच में जरूरत से अतिरिक्त खाना खा लेना। इमोशनल ईटिंग के कई कारण हो सकते हैं। आमतौर पर लोग खुशी के मौके पर इमोशनल ईटिंग ज्यादा करते हैं। शादी, पार्टी, फंक्शन या अन्य जश्न के मौके पर जब आप कई लोगों के साथ इकट्ठा होते हैं और खाने के लिए कुछ खास चीजें होती हैं, तो अक्सर आप शरीर की जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। कई लोगों को अकेलेपन और ऊब के कारण भी खाने की आदत हो जाती है। इसके अलावा कुछ लोग दुख और परेशानी में भी खाने-पीने की तरफ भागते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो थकान होने पर चाय, कॉफी, स्नैक्स आदि की आदत डाल लेते हैं, जबकि उनके शरीर को अतिरिक्त आहार की जरूरत उस समय नहीं होती है।

क्यों खतरनाक है इमोशनल ईटिंग


इमोशनल ईटिंग इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसमें आप खाने का सुख लेने लगते हैं। इससे आपका पेट तो भर जाता है मगर आपको तृप्ति नहीं मिलती है। एक-दो बार आपने किसी भावना के कारण इमोशनल ईटिंग कर ली, तो आपका दिमाग अक्सर आपको मानसिक संवेदना भेजकर खाने के लिए उकसाने लगता है। इमोशनल ईटिंग की खास बात ये है कि ज्यादा खाने के बाद आपको पछतावा भी होता है और अपने ऊपर गुस्सा भी आता है मगर आप अगली बार भी खाने से खुद को नहीं रोक पाते हैं।

हो सकते हैं मोटापे का शिकार


इमोशनल ईटिंग आपको कई तरह के रोगों का शिकार बना सकती है। आमतौर पर इमोशनल ईटिंग वाले लोग मोटापे का शिकार हो जाते हैं। जरूरत से ज्यादा खाने से शरीर खाने के सभी पोषक तत्वों का इस्तेमाल नहीं कर पाता है, जिससे कई तरह की गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं। मोटापा खुद में सैकड़ों बीमारियों की वजह बनता है इसलिए इमोशनल ईटिंग को रोकना बहुत जरूरी है। अपनी भावनाओं पर काबू पाकर और इमोशनल ईटिंग के कारणों को पहचानकर आप इससे आसानी से बच सकते हैं।

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Wednesday, 22 August 2018

मच्छरों से परेशान हैं क्या? ये रहे तुरंत मच्छर भगाने के 3 सबसे कारगर और घरेलू उपाय



मच्छर यानि आपके सिर पर मंडराता बीमारियों का खतरा... बीमारियों से बचना है तो मच्छरों से बचना जरूरी है। लेकिन अगर घर में कॉइल या मॉस्कीटो लिक्विड नहीं है तब आप क्या करेंगे? चलिए हम बताते हैं मच्छरों के लिए 3 ऐसे कारगर घरेलू उपाय, जो आपकी इस समस्या को तुरंत दूर कर देंगे.



जानिए पहला उपाय, जो मात्र 2 मिनट में मच्छरों को रफूचक्कर कर देगा। इसके लिए आपको जरूरत है 3 चीजों की -


1. नीम का तेल


2. कपूर 


3. तेजपत्ता


सबसे पहले नीम के तेल में कपूर मिलाकर एक स्प्रे बॉटल में भर लें। अब इस मिश्रण का तेजपत्तों पर स्प्रे करें और तेजपत्ते को जला लें। तेजपत्ते का धुंआ सेहत के लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है।



इस धुंए के असर से आश्चर्यजनक रूप से घर के सभी मच्छर भाग जाएंगे।



दूसरा उपाय - सोते समय कुछ दूरी पर, सिरहाने कपूर मिले नीम के तेल का दीपक जलाएं, इससे भी मच्छर आपके पास बि‍ल्कुल नहीं नहीं फटकेंगे।



तीसरा उपाय - नारियल तेल, नीम तेल, लौंग का तेल, पिपरमिंट तेल और नीलगिरी के तेल को आपस में समान मात्रा में मिलाएं और एक बॉटल में भरकर रख लें। रात में सोते समय त्वचा पर लगाएं और निश्चिंत होकर सो जाएं। यह तरीका बाजार की क्रीम से भी ज्यादा प्रभावशाली है।





Thursday, 9 August 2018

during monsoon ear infection is also a common problem -बारिश के मौसम में कान के इंफेक्शन का खतरा


बरसात का मौसम कानों के लिए खराब होता है। इस मौसम में कान के बाहरी भाग में जीवाणु और फंगल इंफेक्शन बढ़ जाता है। वहीं, कान के बीच वाले भाग में ओटाइटिस मीडिया नामक संक्रमण भी बढ़ जाता है। कान की पुरानी बीमारियां जो अन्य मौसमों में दबी रहती हैं, वे भी मॉनसून में परेशान करने लगती हैं। ऐसे में कुछ चीजों से बचना चाहिए.


नहाते समय रुई लगाएं 


आयुर्वेदाचार्य डॉ बृजेश गुप्ता कहते हैं, नहाते समय कान में रुई लगाकर पानी जाने से बचाएं। कान को ज्यादा साफ न करें क्योंकि इससे कान की त्वचा में चोट लगने और इसके बाद संक्रमण होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। 

स्विमिंग के दौरान रखें ख्याल 


अगर आप बारिश के मौसम में भी तैराकी करते हैं तो दूषित पानी कान में जाने की वजह से बीमारियां बढ़ जाती हैं। ऐसे में स्विमिंग करते समय ईयर प्लग यूज करें। जरूरत पड़ने पर नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें। 


बारिश में भीगने से बचें 


बारिश में भीगने या फिर वातावरण में नमी होने से जुकाम और गला खराब होने की आशंका रहती है। इसका असर भी कानों पर पड़ता है और कान में दर्द या इंफेक्शन हो सकता है।


ठंडे पदार्थों से बचें 


बरसात के मौसम में ठंडे पदार्थों के अधिक सेवन से बचना चाहिए। जुकाम या गला खराब होने पर शीघ्र ही इनका इलाज कराएं वरना कानों में भी दिक्कत शुरू हो सकती है। 

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Wednesday, 25 July 2018

गर्म दवाईयों से नहीं तुलसी के पत्तों से दूर करें वायरल फीवर

मौसम बदलते ही लोग वायरल फीवर की चपेट में आने लगते हैं। इससे निपटने के लिए वैसे तो बाजार में कई एंटीबायोटिक मौजूद हैं, लेकिन शरीर पर इनके साइड इफेक्ट के साथ मुंह का स्वाद भी बिगड़ जाता है।ऐसे में ये  आसान घरेलू नुस्खे आपको सेहत के इस दुश्मन से जल्द राहत दिला सकते हैं।आइए जानते हैं कैसे


अदरक-



वायरल बुखार को ठीक करने के लिए सबसे पहले अदरक के साथ थोड़ी सी हल्दी, काली मिर्च और चीनी मिलाकर उसका काढ़ा बना लें। दिन में तीन से चार बार इस काढ़े को पीने से बुखार दूर होता है। 


धनिया-



एक ग्लास पानी में एक चम्मच साबुत धनिया डालकर उसे पकाएं। पक जाने पर कप में छानकर उसमें स्वादानुसार दूध और चीनी डाल लें। इसको पीने से आपका बुखार झट से गायब हो जाएगा।



तुलसी-



एक मुट्ठी तुलसी के पत्तों और एक चम्मच लौंग पाउडर को एक लीटर पानी में उबाल कर रख लें। इस पानी को हर 2 घंटे के अंतराल पर लें।


मेथी-



रात को एक चम्मच मेथी के दाने भिगोकर रख दें। सुबह मेथी के दाने में नींबू का रस और शहद मिलाकर खाएं। बुखार ठीक हो जाएगा।


चावल-



एक भाग चावल और आधा भाग पानी डालकर पकाएं। जब चावल आधे पक जाएं तो इसके पानी को अलग कर लें। इस पानी में स्वाद के अनुसार नमक मिलाकर पीने से भी वायरल फीवर ठीक हो जाता है।


लहसुन-



लहसुन को छिल लें। अब इसमें शहद लगाकर इसे खाएं। इससे आपका बुखार भाग जाएगा। 


मुनक्का-



रात में मुनक्का भिगो दे। सुबह उसे खाने से बुखार दूर होता है। 

Tuesday, 24 July 2018

केटोजेनिक आहार से बढ़ सकता है कैंसर दवाओं का असर

एक भारतवंशी समेत शोधकर्ताओं के दल ने पाया है कि केटोजेनिक आहार से कैंसर दवाओं के प्रभाव को और बेहतर किया जा सकता है। इस तरह के आहार में उच्च वसा, पर्याप्त प्रोटीन और निम्न कार्बोहाइड्रेट होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ट्यूमर को खत्म करने के उपचार की क्षमता बढ़ाने का नया तरीका खोजा गया है।


इसमें इंसुलिन प्रेरित एंजाइम फॉस्फेटिडिलिनोजिटोल-3 काइनेज (पीआइ3के) को साधा जाता है। इस एंजाइम का संबंध कोशिकाओं की वृद्धि से होता है। अमेरिका के वेल कार्नेल मेडिसिन के शोधकर्ता लेविस सी केंटली ने कहा, 'पीआइ3के को साधने वाली दवा ब्लड शुगर का निम्न स्तर होने पर ही प्रभावी हो सकती है।
हमने पाया कि केटोजेनिक आहार से इंसुलिन को नियंत्रित करने से कैंसर दवाओं का प्रभाव बेहतर किया जा सकता है।' कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता सिद्धार्थ मुखर्जी ने कहा, 'यह अध्ययन कैंसर उपचार को लेकर नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।'
कुछ मरीज हाइपरग्‍लेसेमिया को पैदा करने के लिए और हाई लेवल के ब्‍लड सुगर को कम करने के लिए यह दवा लेते हैं क्‍योंकि इससे अग्‍नाश्‍य ग्रंथि ज्‍यादा इंसुलिन पैदा करती है। अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इरविन मेडिकल सेंटर के शोधकर्ता सिद्धार्थ मुखर्जी का कहना है कि इस दवा को लेने के बाद भी अगर मरीज का ब्‍लड सुगर सामान्‍य स्‍तर पर नहीं आता है तो उसे दवा लेने बंद कर देना चाहिए। यह अध्‍ययन कैंसर के लिए विशिष्‍ट दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है।
उनका कहना है कि दशकों से हम मनुष्‍य के रस प्रक्रिया को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। कीमोथेरपी या इन दवाओं से कैंसर कोशिकाओं को संवदेनशील बनाते हैं। यह तथ्‍य है कि ये दवाएं प्रतिरोध क्षमता को विकसित कर रही हैं कम से कम पशुओं के मॉडल के रूप में। हम मनुष्‍यों में इसे आजमाने के लिए उत्‍साहित हैं।

Monday, 23 July 2018

दुनिया में सबसे ज्यादा दी जाने वाली दवा है ऐंटिबायॉटिक्स: शोध

भारत सहित कई देशों में ऐंटिबायॉटिक दवाओं की आपूर्ति बढ़ने से वैश्विक स्तर पर ऐंटिबायॉटिक्स का असर बुरी तरह बेअसर होता जा रहा है। ऐसा एक शोध में सामने आया है, जिसमें कानून को बेहतर तरीके से तत्काल लागू करने की जरूरत बताई गई है। 


दुनियाभर में बढ़ा ऐंटिबायॉटिक्स का इस्तेमाल 



शोध में पाया गया है कि साल 2000 और 2010 के बीच ऐंटिबायॉटिक्स का उपभोग वैश्विक रूप से बढ़ा है और यह 50 अरब से 70 अरब मानक इकाई हो गया है। इसके इस्तेमाल में वृद्धि में प्रमुख रूप से भारत, चीन, ब्राजील, रूस व दक्षिण अफ्रीका में हुई है।

ऐंटिबायॉटिक का प्रतिरोध भी बढ़ा 


ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के इमानुएल एडेवुयी ने कहा, ‘ऐंटिबायॉटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल ऐंटिबायॉटिक के प्रतिरोध के फैलाव व विकास को सुविधाजनक बना सकता है। उदाहरण के लिए करीब 57 हजार नवजात सेप्सिस की मौतें ऐंटिबायॉटिक प्रतिरोधी संक्रमण के कारण होती हैं।’ इससे अमेरिका में सलाना 20 लाख संक्रमण व 23,000 मौतें होती हैं और यूरोप में हर साल करीब 25,000 मौतें होती हैं। 

संक्रमण से मौत का खतरा अधिक 


एडेयुवी ने कहा, ‘विकासशील देशों में ऐंटिबायॉटिक प्रतिरोधी संक्रमण के भरोसेमंद अनुमानों की कमी है, लेकिन माना जाता है कि इन देशों में कई और मौतों का कारण बनती हैं।’ इस शोध का प्रकाशन ‘द जर्नल ऑफ इंफेक्शन’ में किया गया है। इसमें 24 देशों के शोध का विश्लेषण किया गया है। 

Tuesday, 10 July 2018

नाईट शिफ्ट में काम करने से हृदयरोग और कैंसर का खतरा, पढ़ें रिसर्च

वैज्ञानिकों ने पाया है कि नाईट शिफ्ट में काम करने से मोटापा और मधुमेह का जोखिम बढ़ जाता है जिससे आगे चलकर हृदयरोग , मस्तिष्काघात और कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है.


वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह अनुसंधान किया है. अनुसंधानकर्ताओं में से एक भारतीय मूल का है. उन्होंने उस मान्यता को नकार दिया है जिसके मुताबिक शरीर के दिन और रात के चक्र को मस्तिष्क की मास्टर क्लॉक संचालित करती है.


इन वैज्ञानिकों का कहना है कि यकृत , आहार नली तथा अग्नयाशय की अलग - अलग जैविक घड़ी होती है. विश्वविद्यालय के हांस वान डोनजेन ने बताया , ‘‘ यह किसी को पता नहीं था कि पाचन क्रिया करने वाले अंगों में जैविक घड़ी शिफ्ट में काम करने से कितनी तेजी और कितनी अधिक बदल जाती है. बल्कि मस्तिष्क की मास्टर क्लॉक भी इनके अनुरूप मुश्किल से ही हो पाती है. ''



उन्होंने कहा , ‘‘ इसके परिणामस्वरूप शिफ्ट में काम करने वाले लेागों के शरीर के कुछ जैविक संकेत कहते हैं कि यह दिन है जबकि कुछ संकेत कहते हैं कि यह रात है , इस तरह चयापचय में गड़बड़ी हो जाती है.'' 

Friday, 8 June 2018

World Brain Tumour Day 2018: इन 6 लक्षणों को भूल कर भी न करें अनदेखा, हो सकता है Brain Tumour

World Brain Tumour Day 2018: हर साल, 40,000 से 50,000 लोगों को ब्रेन ट्यूमर होता है, जिसमें से 20% बच्चे हैं। आप मानेंगे नहीं कि ब्रेन ट्यूमर के भी 120 से अधिक प्रकार हैं, जिनके विभिन्‍न लक्षण होते हैं। Brain Tumor को उसके शुरुआती लक्षणों से पहचाना जा सकता है। 

नई दिल्‍ली: हर साल 8 जून को दुनियाभर में विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस World Brain Tumor Day मनाया जाता है। ब्रेन ट्यूमर एक खतरनाक बीमारी है। इस बीमारी का पता चलने तक रोगी की  9 महीने या एक साल के भीतर ही मौत हो जाती है। हर साल, 40,000 से 50,000 लोगों को ब्रेन ट्यूमर होता है, जिसमें से 20% बच्चे हैं। आप मानेंगे नहीं कि ब्रेन ट्यूमर के भी 120 से अधिक प्रकार हैं, और प्रत्‍येक ट्यूमर के विभिन्‍न लक्षण होते हैं जिनसे इन ट्यूमर की पहचान की जाती है। यह कैंसरयुक्‍त और गैर-कैंसरयुक्‍त भी हो सकता है। जब सिर का ट्यूमर बढ़ने लगता है तो खोपड़ी के अंदर दबाव पड़ने लगता है, जिससे जिंदगी को खतरा हो सकता है। Brain Tumor को उसके शुरुआती लक्षणों से पहचाना जा सकता है। आइये जानते हैं इसके 6 लक्षणों के बारे में जिससे हम सभी आज तक अनजान थे। 

ब्रेन ट्यूमर के शुरुआती लक्षण


1. मुंह में अकड़न आना 

हमारे दिमाग में बहुत सी ऐसी कोशिकाएं होती हैं जो कई अंगों को एक साथ जोड़ती हैं। इसलिए ट्यूमर की कोशिकाएं जिस भी अंगों के आसपास से गुजरती है, वो अंग प्रभावित हो जाता है। ऐसे में यदि यह कोशिकाएं मुंह के पास से गुजरती हैं तो मुंह अकड़ने लगता है और आवाज आना बंद हो जाती है।


2. दौरे पड़ना


ट्यूमर से इंसान में चिड़चिड़ापन आता है। इससे दौरे पड़ने या झटके लगने शुरू हो जाते हैं। जब ब्रेन ट्यूमर मस्‍तिष्‍क में फैलने लगता है तो दिमाग की कोशिकाएं आसपास की कोशिकाओं को प्रभावित करना शुरू कर देती हैं, जिससे दौरे पड़ते हैं।


 3. उल्टी और मितली आना 


ब्रेन ट्यूमर का एक और लक्षण यह है कि इसमें इंसान को सिरदद के साथ उल्‍टियां भी आनी शुरू हो जाती हैं। इसमें कुछ भी खाने-पीने का मन नहीं करता है।


4. सिर में दर्द


सोने के बाद सिर में तेज दर्द होना आम लक्षण है। बहुत से लोग इसे माइग्रेन समझ कर अनदेखा कर देते हैं। सिरदर्द के साथ चक्‍कर आने लगे और आंखों के सामने धुंधला दिखाई देने लगे तो इसे ब्रेन ट्यूमर का लक्षण समझें।


5. वजन बढ़े या कमजोरी महसूस होना 


ब्रेन ट्यूमर के कुछ लक्षणों में चेहरे के कुछ हिससे में कमजोरी आ जाती है। इसके साथ ही अचानक वजन बढ़ने लगता है। 

Thursday, 7 June 2018

डायबिटीज बन सकता है अनियमित पीरियड्स की वजह: शोध


हाल में हुए एक शोध में दावा किया गया है कि जिन महिलाओं को टाइप-2 डायबिटीज की समस्या होती है उनमें अनियमित पीरियड्स का खतरा बढ़ जाता है। ये अध्ययन अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो में किया गया। हालांकि अनियमित पीरियड्स की वजह सिर्फ डायबिटीज ही नहीं होता है इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे प्रेगनेंसी, हार्मोनल असंतुलन, किसी तरह का इंफेक्शन, बीमरियां और दवाओं का अधिक सेवन आदि।


मोटोपे के कारण होता है डायबिटीज और पीसीओएस


जिन महिलाओं का वजह ज्यादा होता है या जो मोटापे से ग्रस्त होती हैं उनमें इस तरह की समस्या ज्यादा पाई जाती है क्योंकि मोटापे के कारण महिलाओं में पीसीओस का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है और पीसीओएस के कारण डायबिटीज और कई तरह की मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। पीसीओएस एक तरह का हार्मोनल डिसआर्डर है जिसमें महिलाओं के ओवरी यानि अंडाशय के किनारों पर छोटी सी गांठ बन जाती है। ये गांठ इंसुलिन को बनने से रोकती है और इंसुलिन की कमी ही टाइप-2 डायबिटीज का कारण बनता है। इसके अलावा इस गांठ की वजह से अण्डोत्सर्ग भी ठीक से नहीं हो पाता है और पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं।

पीसीओएस की समस्‍या के लक्षण


पीसीओएस के लक्षणों पर अक्‍सर लड़कियों का ध्‍यान नहीं जाता है। चेहरे पर बाल उग आना, अनियमित रूप से माहवारी आना, यौन इच्छा में अचानक कमी, गर्भधारण में मुश्किल होना, आदि कुछ ऐसे लक्षण हैं। इसके अलावा त्वचा संबंधी रोग जैसे अचानक भूरे रंग के धब्बों का उभरना या बहुत ज्यादा मुंहासे भी हो सकते हैं।
छोटी उम्र में पीसीओएस के कारण


मोटापा


आजकल मोटापे की समस्‍या बहुत ही आम हो गई है। हर दूसरा व्‍यक्ति ज्यादा वसा युक्त भोजन, व्यायाम की कमी और जंक फूड का सेवन करने के कारण मोटापे से ग्रस्‍त है। मोटापे के कारण आज छोटी उम्र की लड़कियों में भी पीसीओएस की समस्‍या पाई जाने लगी है। अत्यधिक चर्बी से एस्ट्रोजन हार्मोन की मात्रा बढ़ने से ओवरी में सिस्ट बनता है। मोटापा कम करने से इस बीमारी को बहुत हद तक काबू में किया जा सकता है। बीमारी के बावजूद वजन घटाने से ओवरीज में वापस अंडे बनने शुरू हो जाते हैं।

खराब डाइट


जंक फूड शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं इसलिए जंक फूड, अत्यधिक तैलीय, मीठा व फैट युक्त भोजन खाने से बचें। साथ ही डायबिटीज भी इस बीमारी का बड़ा कारण हैं। इसलिए मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। इसके बजाय अपने आहार में हरी-पत्तेदार सब्जियां और फलों को शामिल करें।

लाइफस्‍टाइल


तनाव और चिंता के चलते आजकल की लड़कियां अपने खान पान पर बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देती। साथ ही लेट नाइट पार्टी में ड्रिंक और स्‍मोकिंग लड़कियों की लाइफस्‍टाइल का हिस्‍सा बन गया है। इसलिए पीसीओएस की समस्‍या से बचने के लिए अपनी दिनचर्या को सही करना बहुत जरूरी है। हार्मोंन को संतुलित करके पीसीओएस की समस्‍या को ठीक किया जा सकता है। इसके लिए लड़कियों को सही आहार और नियमित एक्सरसाइज को अपनाना होगा।

Wednesday, 6 June 2018

प्रोस्टेट कैंसर के रोगियों के लिए खुशखबरी


चीनी के वैज्ञानिकों ने प्रोस्टेट कैंसर के लिए जिम्मेदार एक जीन की पहचान की है जिससे इस बीमारी का पता लगाने और उसका इलाज करने में नए तरीके का इस्तेमाल किया जा सकेगा. सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने खबर दी है कि सुजहोउ इंस्टि्टयूट ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलोजी के वैज्ञानिकों ने ‘ पीसीएसईएटी ’ नाम के एक नए बायोमार्कर की खोज की है. 

शोध में सामने आया कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में पीसीएसईएटी अधिक मात्रा में है जिससे संकेत मिला कि पीसीएसईएटी संभावित चिकित्सीय लक्ष्य हो सकता है. यह शोध मई में, ‘ बायोकेमिकल एंड बायोफिजिकल रिसर्च कम्यूनिकेशंस ’ में प्रकाशित हुआ है. शोध के आधार पर वे प्रोस्टेट कैंसर का जल्दी पता लगा सकते हैं.  इसके इलाज की लागत में कमी आ सकती है.  

प्रोस्टेट कैंसर से बचाने के लिए तैयार हुआ आरएनए टीका

प्रोस्टेट कैंसर (पौरुष ग्रंथी में होने वाला कैंसर) भारत में होने वाले दस प्रमुख कैंसरों में से एक है. एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोस्टेट कैंसर से हर साल भारत में 12,231 लोग जान गंवा देते हैं. आंकड़े बताते हैं कि भारत के सभी क्षेत्र प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर से प्रभावित हैं. इसके इलाज के लिए दुनिया भर के विशेषज्ञ कई वर्षों से इसका टीका बनाने की कोशिश कर रहे थे. ब्रिटेन की क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के विशेषज्ञों का दावा है कि उन्होंने एक ऐसी दवा बना ली है, जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाएगी. प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने पर प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होगा और प्रतिरक्षा तंत्र कैंसर कारक कोशिकाओं को बनते ही खत्म कर देगा. 


विशेषज्ञों का दावा, प्रोस्टेट कैंसर का भी इलाज

ब्रिटिश विशेषज्ञों का दावा है कि इस दवा से पुरुषों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर का इलाज भी किया जा सकेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि उनके द्वारा तैयार की गई दवा एक प्रकार का टीका है. इसे कम उम्र में ही पुरुषों को दिया जाएगा, जिससे भविष्य में उन्हें प्रोस्टेट कैंसर होने का खतरा न हो. 



कोशिका तक पहुंचाने के लिए दिया आरएनए टीके का रूप

शोधकर्ताओ का दावा है कि इसे कोशिका तक पहुंचाने का कोई प्रभावी उपाय नहीं मिल रहा था. प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए विशेषज्ञ आरएनए टीका बनाने की कोशिश कर रहे थे. अंत में इसे त्वचा से कोशिका तक पहुंचाने के लिए टीके का रूप दिया. यह टीका शरीर के आनुवांशिकी संदेशवाहक आरएनए का इस्तेमाल करेगा, जिससे  प्रतिरक्षा तंत्र को प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाओं को पहचानने में मदद मिलेगी. इसका परीक्षण प्रयोगशाला में हो चुका है, अब चूहों पर परीक्षण करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. 


जानें क्या हैं प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण

आमतौर पर प्रारम्भिक अवस्था में प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण दिखाई नही देते हैं. उन्नत अवस्था में कुछ लक्षण उभर कर सामने आते है, जैसे कि पेशाब करने में कठिनाई, बार-बार मूत्र त्याग करने इच्छा, सामान्य से अधिक बार पेशाब करना, हड्डियों में दर्द, मूत्र में रक्त, मूत्राशय या आंत्र नियंत्रण में क्षति, कमजोरी या पैर में सुन्नपन आदि इसके कई मुख्य लक्षण हैं.

Tuesday, 5 June 2018

डेंगू और चिकनगुनिया से बचाव के आसान उपाय


मानसून सीज़न में डेंगू और चिकनगुनिया एक आम समस्या है लेकिन ध्यान न दिया जाए तो यह जानलेवा हो सकती है। क्या हैं इसके लक्षण और कैसे बचें इससे, जानें।
मौसम बदलने के साथ ही लोगों को बुखार और ज़ुकाम के अलावा कई तरह की बीमारियां परेशान करने लगती हैं। इन दिनों चिकनगुनिया और डेंगू होने का खतरा भी बढ़ जाता है और कई बार हम पहचान नहीं पाते हैं कि रोगी को चिकनगुनिया या डेंगू बुखार है या फिर सामान्य बुखार है। ऑनक्वेस्ट लैबोरेट्रीज़, नई दिल्ली के डॉ. रवि गौर बता रहे हैं, चिकनगुनिया, डेंगू और सामान्य बुखार के बीच अंतर, जिससे पता लगाया जा सकता है कि रोगी को कौन-सा बुखार है।




1. चिकनगुनिया और डेंगू बुखार के लक्षण लगभग एक जैसे ही होते हैं लेकिन डेंगू चिकनगुनिया की तुलना में ज्य़ादा खतरनाक होता है। चिकनगुनिया की वजह से होने वाला दर्द कुछ महीनों या वर्षों तक बना रह सकता है। चिकनगुनिया 1 से 12 दिन तक रहता है लेकिन इसके लक्षण कई दिनों तक शरीर में मौज़ूद रहते हैं जैसे कि जोड़ों का दर्द। डेंगू 3 से 7 दिन तक रहता है लेकिन डेंगू में कमज़ोरी बहुत ज्य़ादा होती है क्योंकि शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या लगातार गिरती रहती है। सामान्य बुखार में तापमान कुछ समय बाद कंट्रोल हो जाता है।




2. चिकनगुनिया में बुखार, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द और आंखों में तकलीफ जैसी समस्याएं होती हैं जबकि डेंगू में त्वचा पर रैशेज़ कम होते हैं और आंखों पर भी कम असर पड़ता है। वहीं सामान्य बुखार में सिर्फ शरीर का तापमान बढ़ता है और खांसी हो सकती है। चिकनगुनिया एक वायरस है, जो मच्छर के काटने से होता है। जैसे ही वायरस शरीर में प्रवेश करता है, वैसे ही बुखार, खांसी, ज़ुकाम के लक्षण पनपने लगते हैं।




3. चिकनगुनिया में हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द होता है और सूजन भी आ जाती है। साथ ही दर्द सुबह के वक्त ज्य़ादा होता है। वहीं डेंगू में कमर की मांसपेशियों में दर्द होता है और कंधे व घुटने में भी दर्द बना रहता है। सामान्य बुखार में ऐसा नहीं होता।



बचाव है ज़रूरी




 शरीर को पूरी तरह ढककर रखें। इस मौसम में फुल स्लीव्स कपड़े पहनें।
 आप चाहें ऑफिस में हो या घर पर, आपका बच्चा पार्क में हो या स्कूल में या आप शॉपिंग कर रही हों या फिर मॉल जैसी सार्वजनिक जगह पर हों, मच्छर-रोधी क्रीम का इस्तेमाल करके ही घर से बाहर निकलें।



 कुछ लोगों को इसके लोशन या क्रीम से चिपचिपाहट महसूस होने लगती है। ऐसे में बाज़ार में मिलने वाले स्प्रे का भी इस्तेमाल कर सकती हैं, जिससे आपका घर रहेगा मच्छर-रहित।



 मार्केट में आजकल रिस्ट बैंड और पैचेज़ भी उपलब्ध हैं। ये उन बच्चों के लिए हैं, जो जेल या क्रीम लगवाने में आनाकानी करते हैं। ये उनके लिए बेहतर विकल्प हैं। पैच को सिर्फ कपड़ों पर लगाना होता है, जिससे मच्छर दूर भाग जाएंगे। 



 जेल एलोवेरा और सिट्रोनेला के गुणों से भरपूर है। इसे यूज़ करने से किसी तरह की स्किन एलर्जी नहीं होती। 

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Wednesday, 16 May 2018

बड़ी इलायची है हमारे लिए लाभदायक, जानिए कैसे


बड़ी इलायची खाने में स्वादिष्ट होने के साथ साथ सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन सी, फाइबर और पोटेशियम के गुण काफी मात्रा में होते है जिससे आप सिर दर्द से लेकर कैंसर जैसी प्रॉब्लम से छुटकारा पा सकते हैं। आज हम आपको बताएंगे बड़ी इलायची हमारे लिए कैसे फायदेमंद है।

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कामकाज की वजह से आजकल काफी लोग तनाव में रहते है। तनाव से छुटकारा पाने के लिए रात को सोते समय 1 इलायची का सेवन जरूर करें। इसके सेवन से आपको अच्छी नींद आएगी और सुबह फ्रैश भी फील होगा।

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अगर आप मुंह की दुर्गंध से परेशान है तो रोजाना इसे चबाएं। इसके अलावा यह मुंह के घावों को ठीक करने के लिए काफी फायदेमंद है।


बड़ी इलायची कैंसर जैसी प्रॉब्लम से छुटकारा दिलाने में बहुत सहायक है। इसमें एंटी कैंसर और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण काफी मात्रा में होते हैं जो शरीर को ब्रेस्ट, कोलोन और ओवेरियन कैंसर आदि प्रॉब्लम से बचते है।

Wednesday, 11 April 2018

महिला दिवस सुरक्षित मातृत्व दिवस के रूप में मनेगा

देश की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के प्रयास के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय पूरे देश में 8 से 10 मार्च तक विशेष अभियान चलाएगा।केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि तीन दिवसीय अभियान के तहत 8 और 9, 10 मार्च को सभी जिला अस्पतालों, अनुमंडल अस्पतालों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेष स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए जाएंगे।



उन्होंने कहा कि इसमें गर्भवती महिला समेत सभी महिलाएं नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच करा सकती हैं। उन्होंने कहा कि हम देश की महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध हैं और यह अभियान इस उद्देश्य को पूरा करने में मददगार साबित होगा।परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए अनेक गतिविधियां आयोजित कर रहा है। 


सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र/अनुमंडल अस्पताल, जिला अस्पताल तीन दिन के इस अभियान में आवश्यक जांच करेंगे। 40 से 60 वर्ष की महिलाओं के लिए स्तन कैंसर की जांच होगी और 30 से 60 सर्विकल कैंसर की जांच की जाएगी।स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि जन्म पूर्व और जन्म बाद की देखभाल सेवाएं प्रदान की जाएंगी और महिलाओं को महिला तथा शिशु सुरक्षा (एमसीपी) कार्ड जारी किए जाएंगे।


अत्यधिक जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को जरूरत पडऩे पर आगे की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए रेफर किया जाएगा। शिविरों में परिवार नियोजन सेवाएं भी नि:शुल्क उपलब्ध होंगी।महिलाओं को जन्म देने की तैयारी, गर्भवस्था के दौरान खतरा संकेतों, पोषण, संस्थागत डिलिवरी, जन्म के अगले छह महीने तक परिवार नियोजन (पीपीएफपी), गर्भावस्था में देखभाल और बच्चे के जन्म के पश्चात देखभाल, स्तनपान, आयरन फोलिक एसिड और कैल्शियम की पूर्ति, संस्थागत डिलिवरी का महत्व, जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) की जानकारी दी जाएगी।



नई दिल्ली में इस तरह के जांच शिविरों का आयोजन डॉ. राममनोहर लोहिया, सफदरगंज अस्पतालों में किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, महिला अधिकारिता सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा में योगदान के लिए राज्यों के प्रत्येक ब्लाक में एक आशाकर्मी का अभिनंदन किया जाएगा।

Tuesday, 10 April 2018

विश्व होम्योपैथिक दिवसः World Homeopathy Day 2018


आज गंभीर बीमारियों से लेकर लाइफस्टाइल(Life Style) डिजीज तक के इलाज के लिए लोग होम्योपैथी (World Homeopathy) उपचार ले रहे हैं. इसका मुख्य कारण है होम्योपैथी के कोई साइड इफेक्ट(Side effect) नहीं है. आज दुनियाभर में विश्व होम्योपैथिक दिवस मनाया जा रहा है. इसी मौके पर हम आपको बता रहे हैं इससे जुड़ी कुछ अहम जानकारियां.


कौन हैं होम्योपैथी चिकित्सा के संस्थापक-

दुनियाभर में 10 अप्रैल को ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ (World Homeopathy Day 2018) मनाया जाता है. होम्योपैथी दिवस होम्योपैथी के संस्थापक जर्मनी के डॉ. क्रिश्चिन फ्रेडरिक सैमुएल हैनीमेन के जन्मदिन के मौके पर मनाया जाता है.


बढ़ रहा है चलन-

आजकल लोग होम्योपैथी ट्रीटमेंट अधिक ले रहे हैं. इस ट्रीटमेंट को लेने का सबसे बड़ा कारण इसकी दवाओं का साइड इफेक्ट ना होना हैं. अधिकत्तर वही लोग होम्योपैथी ट्रीटमेंट ले रहे हैं जिन्हें ऐलोपैथी ट्रीटमेंट पर भरोसा कम हो गया है. बेशक होम्योपैथी ट्रीटमेंट लंबे समय तक चलता है देर से असर दिखाता है लेकिन इसका असर बेहतर होता है. होम्योपैथी ट्रीटमेंट का असर ठीक से होने के लिए जरूरी है कि डॉक्टर के दिशा-निर्देशों का सही से पालन किया जाए. यदि ऐसा ना हो तो होम्योपैथी ट्रीटमेंट से आपका ठीक होना मुश्किल है.


जानिए ये जरूरी बातें भी-




होम्योपैथी की दवाएं हमेशा ठंड जगहों(Cold Places) पर ही रखनी चाहिए. साथ ही इसकी शीशी को खुले में बिल्कुल ना रखें.

होम्योपैथी की दवाएं फिर वो चाहे लिक्विड फॉर्म में हो या गोलियो में इन्हें हाथ में लेकर कभी ना लें. शीशी ये डायरेक्ट मुंह में डालें.

होम्योपैथी का ट्रीटमेंट बीच में ना छोड़े. पूरा ट्रीटमेंट लें. अगर इलाज बीच में छोड़ा तो शुरूआत से आपको दोबारा ट्रीटमेंट लेना पड़ सकता है.

डॉक्टर ने जितनी दवाएं बताई हैं उतनी गोलियां ही खाएं अधिक गोलियों का सेवन ना करें.

Friday, 23 March 2018

5 सुपरफूड जो त्वचा को हेल्दी और सुन्दर बनाते है



आपकी त्वचा को सुन्दर बनाने  के लिए सैकडों ब्यूटी प्रोडक्ट मार्किट में  उपलब्ध हैं लेकिन इनके साइड इफेक्ट ज्यादा  हैं. अगर आप बिना साइड इफेक्ट्स के अपनी त्वचा को हेल्दी और सुन्दर  बना सकते हैं. बस आपको अपने खाने  में थोड़ा बदलाव लाना  पड़ेगा . आज  जानते हैं आपको डायट में क्या- क्या  चीजों को शामिल करना हैं.


स्ट्राबेरी में  विटामिन सी होता है. इसके खाने से  सूरज की रोशनी में त्वचा खराब नहीं होती है . स्ट्राबेरी में मौजूद विटामिन ई से त्व‍चा को ख़राब  होने से बचाते हैं.

अंडे में बायोटीन अच्छी मात्रा होती है. साथ ही इसमें मौजूद विटामिन बी त्वचा के साथ-साथ आँखों और बालों के लिए भी अच्छा होता  है. अंडे में मौजूद सेलेनियम बढ़ती उम्र में त्वचा पर पड़ने वाले प्रभाव को भी कम करता है.

गाजर में विटामिन ए होता है और त्वचा के टिश्यू को सही  करने और संतुलित करने के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है. इससे खाने से  त्व‍चा में रूखापन भी नहीं रहता.

बादाम में  फैटी एसिड और विटामिन ई पाया जाता है जो कि त्वचा को सूरज की रोशनी के कारन त्वचा को  खराब होने से बचाता है

पानी पीने से ना सिर्फ त्वचा पर चमक आती  है बल्कि त्वचा पर पड़ने वाली झुरिर्यों और दाग  की समस्या को भी दूर किया जा सकता है.

Monday, 19 March 2018

हार्ट अटैक से बचाएगा मोबाइल एप


 हार्ट अटैक के आने का पता अब आपको पहले चल जाएगा क्यू की  ये काम करने वाला है एक मोबाइल  एप. शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मोबाइल एप विकसित किया है जो हृदयाघात के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार आलिंद फिब्रिलेशन की पहचान कर सकेगा. फिनलैंड में टुर्कू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जुहानी ऐराक्सिनेन ने कहा, “पहली बार सामान्य उपकरण ऐसे नतीजे पर पहुंच पाया है, जिससे वह मरीज के इलाज में सहायता प्रदान कर सके”. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस एप को कुछ समय तक और विकसित किया जाएगा.

     
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इस वजह से डॉक्‍टर भी पता नहीं लगा पाते थे हार्ट अटैक के आने का पता
हृदय गति का  बहुत तेज गति से धड़कने की क्रिया को आलिंद फिब्रिलेशन कहते हैं, जिससे हृदय का काम बंद करना और हृदय संबंधित  समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में  हार्ट अटैक को रोकने के लिए समय पर इसकी पहचान होना बहुत जरूरी है. रुक-रुक कर आलिंद फिब्रिलेशन होने के कारण वर्षो से डॉक्टरों को भी इसका पता नहीं चलता था, जिस कारण यह खोज और भी ज़रूरी  है.

300 मरीजों पर की रिसर्च
इस शोध के दौरान 300 मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें लगभग आधे लोग आलिंद फिब्रिलेशन से पीड़ित थे.शोधकर्ता मोबाइल एप की सहायता से रोग की पहचान करने में कामयाब रहे. शोधकर्ताओं के अनुसार इससे लगभग 96 फीसदी तक सही परिणाम मिले.

कैंसर के मरीजों में खुदकुशी का खतरा 5 गुना ज़्यादा रहता है.

प्रोस्टेट, मूत्राशय और गुर्दा के कैंसर के मरीजों में खुदकुशी करने का खतरा पांच गुना अधिक होता है. भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक सहित अनुसंधानकर्ताओं के एक नए सर्वेक्षण में इस बात माना  गया है. उन्होंने अपने सर्वेक्षण में साथ ही यह दिखाया है कि कैंसर के मरीजों के आत्महत्या करने की आशंका आम लोगों से तीन गुना अधिक होती है. कैंसर का पता चलने और उसके उपचार के दौरान गंभीर मानसिक तनाव इसके प्रमुख कारण  है. कैंसर के पांच से 25 प्रतिशत मरीज अवसाद के शिकार हो जाते हैं और कई अन्य मरीज पोस्ट- ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर( पीटीएसडी) से प्रभावित हो जाते हैं. 

Thursday, 15 March 2018

डब्ल्यू एच ओ ने 'रोग एक्स' को प्रारंभिक रोगों की सूची में शामिल किया



विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 'रोग एक्स' को  प्रारंभिक वाले रोगों में सूची में शामिल किया है जो आने बाले  भविष्य में घातक वैश्विक महामारी का ख़तरा बन सकता है, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इससे निपटने के लिए अनुसंधान और विकास में तेजी लाने के लिए तत्काल उपाय कि घोषणा कर दी  है.


'रोग एक्स' आर एंड डी ब्लूप्रिंट की 2018 की वार्षिक समीक्षा में सूची में शामिल किया है। डब्ल्यूएचओ द्वारा विकसित सूची में प्रभावी दवाओं या टीकों की कमी वाले रोगों के अनुसंधान और विकास को प्राथमिकता देने और गति में लाने पर ज़ोर दिया  है।

डब्लूएचओ ने सोमवार को एक बयान में कहा कि 'रोग एक्स' यह तथ्य प्रदर्शित करता है कि एक भी रोग करने बाला  विषाणु या जीवाणु गंभीर अंतर्राष्ट्रीय महामारी का कारण हो सकता है।

इसके अलावा सात अन्य संभावित वैश्विक रोगों की सूची शामिल किया गया है जो सभी प्रभावकारी दवा या टीका की कमी से संबंधित है। इस सूची में क्रिमियन-कॉंगो हीमोरहैजिक फीवर (सीसीएचएफ), इबोला वायरल डिसीस, मारबर्ग वायरस डिसीस, लासा फीवर, मिडल ईस्ट रिस्पायरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस (एमईआरआस-सीओवी) और सवर अक्यूट रिस्पायरेटरी सिंड्रोम (एसएआरआरएस), निपास और हेनीपावायरल डिसीस रिफ्ट वैली फीवर (आरवीएफ) और जीका शामिल हैं।

Wednesday, 14 March 2018

अंडे के इस हिस्से खाने से कैसे बनाए शरीर बलशाली , आज जान लीजिए


कुछ लोग नही जानते है कि अंडे का कौन-सा हिस्सा सेहत के लिए फायदेमंद होता है.

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अंडे का सफेत वाला हिस्सा या फिर पीली  वाला हिस्सा,  ये जानना जरुरी है. बता दें कि जितना प्रोटीन अंडे की जर्दी में होता है उससे बस थोड़ा ही कम प्रोटीन इसके सफेद भाग में पाया जाता है.

प्रति 100 ग्राम में अंडे की पीली जर्दी में करीब 16 ग्राम प्रोटीन होता है. वहीं इसके सफेद भाग में 11 ग्राम प्रोटीन होता है.


 रोज एक अंडा अगर आप खाने मे   में शामिल कर रहे हैं तो आप शरीर में करीब पांच प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा को पूरा कर रहे हैं. आपकी सेहत अक्च्ची रखता है.

प्रोटीन की जरूरत हमारे शरीर में सबसे ज्यादा माश  को होती है. इसके सेवन से हमारी मसल्स स्ट्रॉन्ग बनती हैं. प्रोटीन, टिशू को बेहतर कर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है.

अंडे खाने  से आपके सेल्स बेहतर होते हैं और इससे एंजाइम बनते हैं जो हिमोग्लोबिन और मेटाबॉलिज्म को मजबूत करने में मदद करते हैं.

Monday, 12 March 2018

अगर आप कब्ज से परेशान हैं,तो रोज खाएं ये 4 फूड


 अगर आप कब्ज से परेशान हैं, तो अपने भोजन में फलों और सब्जियों को शामिल करें. इनमें बहुत ज्यादा मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो हमारे पाचन तंत्र को सही रखता है. अक्सर यह देखा जाता है कि लोगों का पेट सही नहीं रहता है, फिर भी अपने खाने-पीने की सामग्रियों पर ध्यान नहीं देते. जब तक आपका पेट सही नहीं रहेगा तब तक आप अपना काम भी ठीक से नहीं कर पाएंगे और दिनभर असहज महसूस करेंगे. इसके लिए जरूरी है कि आप अपने भोजन में बीन्स, कद्दू, आलू, चावल और फलों को शामिल करें. आप जो भोजन करते हैं, उसके अलावे मौसमी फल जैसे- संतरा, मौसमी, गाजर, केला, सेब, नाशपाती, अंगूर, तरबूज, चेरी, पपीता, आंवला आदि भी खाएं. इन फलों में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो हमारे पेट की अच्‍छी तरह से सफाई करता है. 

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चावल 

चावल सुपाच्य भोजन होता है और यह हमारे पेट की समस्यायों को दूर करता है. यह हमारे शरीर यूरिक एसिड जैसे विषैसे पदार्थ को बाहर निकालने में मदद करता है. इसलिए, अगर आप चावल खाने के शौकीन हैं, तो यह आपके लिए बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम मजबूत बना रहता है.


आलू 

आलू में पाया जाने वाला फाइबर हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम को सही बनाए रखता है, जिससे कब्ज जैसी बीमारी होने का खतरा कम हो जाता है. आप इसे जैसे कई तरह से खा सकते हैं. इसे उबालकर सब्जी के रूप में खा सकते हैं या आप चाहे तो इसके परांठे भी बना कर खा सकते हैं. इसके अलावे भी कई तरह से खा सकते हैं.

कद्दू

कद्दू आसानी से डाइजेस्ट होने वाली सब्जी है और इसमें फाइबर और पानी बहुत ज्यादा होता है, जो कब्ज से लड़ने की क्षमता रखता है. 

हरी बीन्स

कब्ज को ठीक करने में हरी बीन्स को बहुत ही कारगर फूड माना जाता है, क्योंकि यह आपकी आंत को स्वस्थ रखता है और इसे आपके मल को नियमित करने का अच्छा स्रोत भी माना जाता है. बीन्स खाने से हमारे शरीर को प्रोटीन भी मिलता है, क्योंकि बीन्स में प्रोटीन बहुत पाया जाता है.

सिर दर्द से मिलेगी निजात, अपनाएं ये घरेलू उपचार


आज के दौर में लोगों को काम की टेंशन काफी रहती है. इसके अलावा लोगों में थकान भी हो जाती है. इनके कारण अक्सर लोगों को सिर दर्द की समस्या का सामना करना पड़ जाता है. वहीं कई दूसरे कारणों की वजह से भी लोग सिर दर्द के शिकार हो जाते हैं. ऐसे में लोग तरह-तरह की दवाईयों का इस्तेमाल करने लग जाते हैं, जिससे सेहत पर बुरा असर भी पड़ने लग जाता है.

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दवाईयों का इस्तेमाल न करके घरेलू उपचार अपनाकर भी सिर दर्द की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. तो जान लीजिए सिर दर्द को दूर करने के ऐसे ही कुछ घरेलू उपचारों के बारे में...

सोंठ का पेस्ट

सर्दी में सिर दर्द से परेशान रहने वाले लोगों को सोंठ काफी राहत देने में मददगार साबित हो सकता है. इसके लिए पानी में सोंठ पीसकर माथे पर लगाने से सर्दी से होने वाला सिर का दर्द रुक जाता है.

तुलसी और अदरक

तुलसी और अदरक के इस्तेमाल से भी सिर के दर्द से निजात पाई जा सकती है. इसके लिए तुलसी की पत्तियों का और अदरक का रस एक साथ मिलाएं. इसके बाद इसे माथे पर लगाएं. वहीं इस रस को सिर दर्द से परेशान व्यक्ति को पिलाया भी जा सकता है. इससे सिर दर्द में काफी राहत मिलेगी.



लौंग के तेल से मालिश

लौंग के इस्तेमाल से भी सिर दर्द को दूर किया जा सकता है. लौंग में दर्द खत्म करने के गुण होते हैं. लौंग को गर्म करके किसी कपड़े में बांधकर सूंघने से सिर दर्द में बहुत राहत मिलती है. इसके अलावा लौंग के तेल से अपने माथे की मालिश करने से भी दर्द से निजात पाई जा सकती है.


नींबू और चाय

चाय में नींबू मिलाने से भी सिर दर्द से राहत पाई जा सकती है. इसके लिए नींबू को चाय में निचोड़कर पीना चाहिए.

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Friday, 9 March 2018

अब खराब नहीं होगा लीवर, यदि खाएंगे ये 6 फूड्स


 मनुष्य का लीवर स्वस्थ रहने से कब्ज, ऐंठन, सूजन और एसिडिटी की समस्या नहीं होती हैं। लीवर ब्लड शुगर के स्तर को रेगुलेट करता है और थकान से बचाता है। लीवर प्रोटीन उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पित्त में विटामिन, मिनरल और कार्बोहाइड्रेट को स्टोर भी करता है। ऐसे में कुछ फूड्स हैं जिससे रेगुलर खाने से आपका लीवर स्वस्थय बना रहेगा।
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पत्तेदार और हरी सब्जियां 
ब्रोकली, पत्तागोभी आदि पत्तेदार सब्जियां हैं। इन सब्जियों में उच्च मात्रा में फ्लेवनॉयड और कैरोटीनॉयड जैसे फाइटोन्यूट्रिएंट पाये जाते हैं जो लीवर को सही तरीके से कार्य करने में मदद करता है। ये सब्जियां पेट को कैंसर रोगों से बचाती हैं।वहीं, गहरे रंग की हरी सब्जियां हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक और ब्रुसेल स्प्राउट में उच्च मात्रा में सल्फर पाया जाता है जो लीवर से टॉक्सिक पदार्थों को निकालता है।

अंकुरित बीज और बेरी
अंकुरित बीज जैसे चना या अखरोट आदि खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। इसमें प्रोटीन और एंजाइम की मात्रा ज्यादा होती है और यह शरीर की क्रियाओं को बढ़ाने का काम भी करता है। अंकुरित बीज खाने से लीवर का संक्रमण भी दूर हो जाता है।वहीं,  बेरी में एंटीऑक्सीडेंट और एंथोसाइनिन होता है। बेरी का जूस लीवर को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है और उसे स्वस्थ रखता है। हफ्ते में तीन बार बेरी खाने से लीवर के संक्रमण से बचाव होता है।

ऑलिव ऑयल और फैटी फिश
फैटी फिश मैकेरल और सालमन जैसी फैटी मछलियों में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है जो लीवर के सूजन को कम करता है। यह लीवर में वसा जमने से रोकता है और एंजाइम के स्तर को नॉर्मल रखता है और इंसुलिन को भी सुधारता है। ऑलिव ऑयल लीवर और हार्ट को स्वस्थ रखने में फायदेमंद होता है। एक चम्मच ऑलिव ऑयल का नियमित सेवन करने से लीवर में ब्लड का फ्लो भी ठीक रहता है।

सर्वाइकल कैंसर से हर साल 74 हजार महिलाओं की मौत


भारत में सर्वाइकल कैंसर से हर साल 74 हजार महिलाओं की मौत के मद्देनजर महिलाओं को इस खतरे से जागरूक करने के लिए प्रिवेंटिव हेल्थकेयर एक्सपर्ट और इंडस हेल्थ प्लस प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक कंचन नायकवाड़ी ने कुछ उपाय सुझाए हैं। विश्व भर में सर्वाइकल कैंसर की वजह से होने वाली मौतों में से एक तिहाई भारत में होती हैं।
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महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का पता देरी से चलने के कारण यह उनकी मृत्यु का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। इस बीमारी से सुरक्षित रहने का सबसे प्रभावी तरीका है, समय पर इसकी जांच करवाना। हालांकि, इसके बारे में जानकारी का अभाव रुकावट पैदा करता है।

सर्वाइकल कैंसर के कारण गिनाते हुए कंचन नायकवाड़ी ने कहा, “वह कैंसर जो सर्विक्स की लाइनिंग को प्रभावित करता है, उसे सर्वाइकल कैंसर कहा जाता है। शहरी लोगों की तुलना में यह बीमारी ग्रामीणों में ज्यादा होती है। सर्वाइकल कैंसर का सबसे प्रमुख कारण इंसानी पेपिलोमा वायरस या एचपीवी होता है। एचपीवी वायरस के संवाहक के साथ यौन संपर्क में आने से एचपीवी फैलता है।”

लक्षणों का जिक्र करते हुए कंचन ने कहा, “योनी से असामान्य रक्तस्राव, सेक्स या फिर टेंपोन इंसर्ट करने के दौरान रक्तस्राव होना, यौन संबंध बनाने के दौरान दर्द महसूस होना, योनी से रक्तमिश्रित अनियिमित डिसचार्ज, मासिकधर्म के बीच में योनी से रक्तस्राव, कमर, पैर या पेडू में दर्द महसूस होना, थकान, वजन में कमी, भूख ना लगना इसके प्रमुख लक्षण हैं।”

कैंसर मुक्त रहने के लिए हेल्थकेयर एक्सपर्ट ने कहा, “स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास नियमित जांच करवायें, हर तीन साल पर पैप स्मीयर टेस्ट करायें, एचपीवी वायरस से बचाव के लिए लगाए जाने वाले टीकों के बारे में अपने फिजिशियन से बात करें, धू्म्रपान छोड़ दें, अपनी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए सेहतमंद खाना खाएं और व्यायाम करें।”

उन्होंने कहा कि अगर कैंसर की पहचान समय रहते कर ली जाए तो इससे बचाव और इलाज दोनों संभव है। इसके बारे में जानकारी हासिल करें और साथ ही अपने आस-पास की महिलाओं को भी इस जानलेवा बीमारी से अवगत कराएं।

किचन में छिपा हुआ है हार्ट अटैक का रामबाण उपचार


हार्ट अटैक आज के समय में आम समस्या बन गई है. जब दिल तक खून पहुंचने में दिक्कत होती है तो दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक की आशंका होती है. दिल की बीमारी का इलाज समय से कराना चाहिए नहीं तो यह जानलेवा साबित हो सकती है. दिल की बिमारियों का इलाज महंगा होता है इसलिए आम आदमी इसका खर्चा उठाने में सक्षम नहीं होता है. इलाज के लिए पैसे नहीं होने पर यह और भी जानलेवा होना लाजमी है. हार्ट अटैक के लिए आयुर्वेदिक उपाय मौजूद हैं जिससे इसका इलाज संभव है.

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हार्ट अटैक के लक्षण

हार्ट अटैक आने से पहले कुछ लक्षण सामान्य होतें हैं जिनसे हार्ट अटैक की संभावनाओं का पता चल जाता है. ऐसे समय में सांस फूलना आम बात हैं. ऐसे में ज्यादा पसीना, सीने में दर्द और जलन, उल्टी आना, सिल चकराना, घबराहट होना और पेट में दर्द होना महसूस होता है.


आयुर्वेद से दिल का इलाज

आयुर्वेद की मदद से बिना एंजियोप्लास्टी के करीब 80 फीसदी हार्ट अटैक की संभावना को टाला जा सकता है. इससे दिल की दूसरी बीमारियां भी कम हो जाती है. दिल में खून सही मात्रा में नहीं पहुंचना हार्ट अटैक की संभावना को बढ़ा देता है ऐसे में हार्ट ब्लॉकेज को खोलने के लिए चिकनाई से पैदा होने वाले एसिड को खत्म किया जाता है. दिल की बीमारियां भी इससे खत्म हो जाती हैं. दिल की बीमारियां एसिडिटी के कारण होती है पेट में जब एसिडिटी अधिक हो जाती है तो एसिड खून में मिल जाता है और रक्त वाहिनियों में एसिड ब्लड आगे नहीं बह पाता और ब्लॉकेज की समस्या उत्पन्न होती है.

लौकी है फायदेमंद

हार्ट अटैक का आयुर्वेदिक इलाज करने के लिए ब्लड एसिडिटी को क्षारिय वस्तुएं खाने की सलाह दी जाती है. इसे खाने से ब्लड में अम्लता घट जाती है और ब्लॉकेज खुल जाता है. ऐसे में लौकी की सब्जी और लौकी का जूस फायदेमंद है, जो रक्त की अम्लता कम करती है.

लौकी के रस में तुलसी और पुदीना मिलाएं

लौकी की जूस में तुलसी की पत्ते को मिला कर पिया जा सकता है. तुलसी की पत्ती में क्षारीय गुण होते हैं इसके अलावा पुदीना भी मिला कर पीने पर लाभ मिलता है. इसके स्वाद को बदलने के लिए आप सेंधा नमक मिला सकते हैं इससे कोई हानी नहीं होगी.

मौसम बदल रहा है, अगर दिखे ये लक्षण तो ना करें नजरअंदाज


जब भी मौसम चेंज होता है, तो ज्यादातर लोग बीमार होने लगते हैं. ऐसे मौसम में मन आलस से भर जाता है और शरीर थका-थका रहने लगता है. ऐसे में वायरल फीवर होने का चांस बढ़ जाता है, क्योंकि इस मौसम में वायरल फीवर के वायरस एक्टिव हो जाते हैं और गले पर असर डालना शुरू कर देते हैं. जिन लोगों को वायरल फीवर हो जाता है, उन्हें बहुत ही सावधानी से रहना चाहिए, क्योंकि दूसरे व्यक्ति को भी संक्रमण हो सकता है. यह फीवर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत ही आसानी से पहुंच जाता है और संक्रमित कर देता है.

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वायरल फीवर के लक्षण

जब कोई व्यक्ति वायरल फीवर से संक्रमित हो जाता है, तो उसे थकान महसूस होने लगती है, शरीर में दर्द होने लगता है. इस तरह के लक्षण के दिखते ही तुरंत डॉक्टर से इलाज कराना चाहिए, क्योंकि सही समय पर इलाज नहीं होने से इसका संक्रमण दूसरे व्यक्ति को भी हो सकता है. सिर दर्द, शरीर दर्द, भूख नहीं लगना, जोड़ों में दर्द होना, आंखें लाल होना, खांसी और जुकाम होना, कमजोरी महसूस होना आदि वायरल फीवर के प्रमुख लक्षण हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत इलाज कराना चाहिए.

जानें, वायरल फीवर के क्या हैं लक्षण    

कमजोर लोगों को होता है वायरल फीवर

अगर आपके शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, तो वायरल फीवर होने का भी खतरा बना रहता है. अक्सर उन्हीं लोगों को यह फीवर होता है जिनका इम्यून सिस्टम मजबूत नहीं होता है. अगर वायरल फीवर का इलाज तुरंत नहीं करवाया जाता है, तो यह आपके इम्यून सिस्टम को और ज्यादा कमजोर कर देता है, जिससे किसी दूसरी बीमारी के होने का भी डर बना रहता है.

ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए

चेंज हो रहे मौसम में फ्रिज में रखा ठंडा पानी और कोल्ड ड्रिंक पीने से बचना चाहिए. ठंडा पानी पीने से हमारे गले में वायरल फीवर का वायरस एक्टिव हो जाता है और यह हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर करना शुरू कर देता है. 

प्रदूषित हवा से क्यों है डायबिटीज का खतरा!


अमरीका के कैलिफोर्निया में लगभग एक हजार से अधिक लोगों पर किए गए शोध में पाया गया कि प्रदूषित हवा से डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण से शरीर में इंफ्लेमेशन की मात्रा बढ़ जाती है जो शुगर के स्तर को गड़बड़ाकर डायबिटीज का कारण बनती है। फिलहाल इस संबंध में शोध जारी हैं। जयपुर स्थित एमएमएस अस्पताल के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. प्रकाश केसवानी के अनुसार वायु प्रदूषण प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।


रक्तहोता प्रदूषित :चूल्हे, फैक्ट्री, कारखानों और गाडिय़ों आदि से निकलने वाले धुएं में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड आदि कैमिकल्स का समूह सांसनली से होते हुए सबसे पहले फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है।

इनमें बेहद सूक्ष्म कण भी होते हैं जो फेफड़ों के अलावा रक्तवाहिकाओं में प्रवेश करके उन्हें भी प्रभावित करने लगते हैं जिससे शरीर के अन्य अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। यह स्थिति शारीरिक प्रक्रियाओं के लिए एक आसामान्य व तनावयुक्त स्थिति बन जाती है। ऐसे में कार्टिसोल, एड्रीनलिन व नॉर एड्रीनलिन जैसे स्ट्रेस हार्मोंस जरूरत से ज्यादा स्त्रावित होने लगते हैं। इससे ग्लूकोज का मेटाबॉलिज्म बिगड़ जाता है व डायबिटीज की शुरुआत होती है।

हाई कोलेस्ट्रॉल सामान्यत: हमारे शरीर को कोलेस्ट्रॉल की सीमित मात्रा मेें जरूरत होती है ताकि यह कोशिकाओं, हार्मोन व पाचकरस का निर्माण कर सके। इसका निर्माण लिवर करता है। लेकिन जब सांस के साथ प्रदूषित वायु अंदर जाती है तो यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा देती है।

इन्हें ज्यादा खतरा जो लोग ज्यादा देर तक प्रदूषित हवा में रहते हैं, उनमें इंसुलिन बनने व कार्य करने की क्षमता कम होने लगती है। इससे रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ती है व कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक हो जाता है। इसके अलावा जिनका वजन अधिक हो, फैमिली हिस्ट्री या तनाव में रहने वाले लोगों को भी डायबिटीज हो सकती है।

ध्यान रखें
व्यायाम, वॉक व जॉगिंग आदि के लिए सुबह का समय चुनें क्योंकि इस दौरान हवा में प्रदूषण की मात्रा कम होती है।